कविता की व्याख्या विविध रचनाकारोंने अपनी-अपनी सोच से की हैं। कोई इसे अपनी आन्तरिक अनुभूती कहता है, तो कोई इसे मनमें चल रहे द्वंद को बाहर निकालनेका माध्यम, तो कोई कविताओंकों समाज में हो रही अनितियों को न सहते जानें से वह शब्दोंके माध्यम से उसे पिरोता हैं ।
कविताओं का रूप गझलों गीतों, कविताओं, छंदो, दोहो के द्वारा होता है। मगर वह कहता है अपनी मनकी, न रहनेवालि बात हमारा माध्यम जो भी हो वह उसे साझा कर अपनी मनकी पिड़ा को इन शब्दोंके द्वारा बाहर निकालकर समाज को कुछ देना चाहता है. अपनी मन की भड़ास वह बाहर निकालताही है, क्योंकी उसे रहा नही जाता इस लिए वह कविताएं साहित्य रचता हैं क्योंकी वह उसका कामही हैं।
यह देश समाज के लिए अच्छी बात है, क्योंकी इनसें समाज मानव जाती किस राहपर खड़े है यह उन्हे दिख पडता हैं।
मैने भी मेरी अनुभूती के द्वारा इसे कविता का रूप देकर बाहर निकालने की कोशीश की हैं।
मैं कोई एक छंदबद्ध में कविताएं न पिरोकर मुझे जैसे जैसे बनपडे मै कविताएं रचनें की कोशीश की हैं, मैंने समाज के सभी विषय इनं रचना में पिरोंनेका प्रयत्न किया हैं।
इन कविताओंका जन्म हिंदी में निकलनेवाली इंकलाब पब्लिकेशन मुंबई से निकलनेवाली संपादकिय संकलन को देख हुआ हैं।
इसमें मेरी कुछ कविताएं शामिल हुई है यह भी एक कारण रहा हैं। यह कविता संग्रह निकालने में मेरे परिचय मित्रोंकाही बहुत बड़ा सहयोग रहा है।
अॅड. शेषराव चव्हाण सर जैसे नरेंद्र चव्हाण सर, मोरे डि.एन. सर दतात्रय भोस्कर सर, प्रभाकर कांबळे सर, डि.एन. ठाकूर सर, अप्पा नायक (पवार) सर, अॅड. सुरेंद्र नाईकवाडे सर, बाबुराव सकवान, सुवर्णकार सर, कविमित्र रतन आडे सर, पिन्टू चव्हाण सर, और इनके साथ ही साथ मॅडम तारामती आनंद गुट्टे, सौ रंजनाबाई सुभाष गोरकट्टे, इनकाही मैं सदा के लिए शुक्रगुजार रहूँगा।
इनके साथी मैं श्रीनिवास बुलबुले सर और प्रल्हार घोरबांड गुरुजी इनका ही शुक्रगुजार रहूँगा जिन्होंने बहुत सुंदर ढंग से यह संग्रह तयार करनें मे अपना सहयोग दिया हैं। मैं अपनी इतनीही बात रखते हुऐ यह संग्रह सबको पसंद आएगा यह मनोभाव व्यक्त करते हुए मैं प्रकाशक गणेश राठोड दमाळ प्रकाशन काभी आभार व्यक्त करना चाहुगा, यह छोटासा मनोगत समाप्त करता हूँ धन्यवाद ।
शेषराव जाधव 'शेष', लोहा.