Hind-E-Ratna Maluki Banjaran
पुस्तक समीक्षा: 'बंजारन' – हिंद-ए-रत्न मल्लुकी बंजारन की गौरवगाथा
लेखक: डॉ. अशोक शंकरराव पवार
डॉ. अशोक शंकरराव पवार की यह शोध-आधारित कृति भारत के उस विस्मृत इतिहास को पुनर्जीवित करती है, जहाँ कबीलाई गौरव और राष्ट्रीय अस्मिता एक साथ मिलते हैं। यह पुस्तक मुख्य रूप से 'हिंद-ए-रत्न' मल्लुकी बंजारन के अदम्य साहस और उनके ऐतिहासिक कद को समर्पित है।
समीक्षा के मुख्य बिंदु:
1. बादशाह अकबर और 'हिंद-ए-रत्न' की उपाधि
लेखक ने ऐतिहासिक संदर्भों और लोक-स्मृतियों के माध्यम से मल्लुकी बंजारन के उस गौरवशाली क्षण को उकेरा है जब मुगल सम्राट अकबर ने उनकी वीरता और बुद्धिमत्ता का सम्मान किया था। पुस्तक में उद्धृत ये पंक्तियाँ उनके प्रभाव को स्पष्ट करती हैं:
“मल्लुकी मिली बादशाह अकबर से, जिह बेटी कह बिठलाई।। > धडा पनसेरी, काठ करोडा। ताम्रपत्र उपरसेही, ‘हिंद-ए-रत्न’ पुरस्कार पाई।।”
ये पंक्तियाँ दर्शाती हैं कि अकबर ने उन्हें न केवल 'हिंद-ए-रत्न' से नवाजा, बल्कि उन्हें अपनी 'बेटी' के समान सम्मान देकर ताम्रपत्र पर अधिकार भी प्रदान किए।
2. सोलह जातियों में सम्मान और पहचान
डॉ. पवार बताते हैं कि मल्लुकी बंजारन ने अकबर के दरबार में अपनी बात (रागडी) इतनी प्रखरता से रखी कि बादशाह को भी उनके आगे झुकना पड़ा और उनके समाज के सम्मान की सौगंध खानी पड़ी:
“निशाना नंगारा, सोलह जातीओंमें सन्मान कराई। मल्लुकी बंजारा अकबर के दरबार में रागडी लिहाई।।”
यह दर्शाता है कि मल्लुकी बंजारन केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि एक कुशल कूटनीतिज्ञ और अपने समाज की रक्षक थीं।
3. बंजारा समाज: भारत की आर्थिक और सांस्कृतिक रीढ़
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राजस्थानी जड़ें: लेखक ने सिद्ध किया है कि अपनी भाषा और संस्कृति के कारण यह 'एथनिक नोमैडिक ट्राइब' मूलतः राजस्थान से ताल्लुक रखती है।
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स्वतंत्रता सेनानी के रूप में: पुस्तक मल्लुकी बंजारन को एक महान स्वाधीनता सेनानी और महिला सशक्तिकरण के 'रोल मॉडल' के रूप में प्रस्तुत करती है।
4. आधुनिकता का संकट
लेखक ने बड़ी गहराई से यह मुद्दा उठाया है कि वैश्वीकरण के दौर में इस 500 साल पुरानी समृद्ध संस्कृति और लोक-परंपराओं पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। यह पुस्तक उस पहचान को बचाने की एक पुकार है।
निष्कर्ष:
डॉ. अशोक शंकरराव पवार की यह पुस्तक हर उस पाठक के लिए है जो भारत के वास्तविक और अनछुए इतिहास को जानना चाहता है। 'हिंद-ए-रत्न' मल्लुकी बंजारन का जीवन यह सिखाता है कि आत्मसम्मान और वीरता के लिए किसी महलों की ज़रूरत नहीं होती, वह रघुकुल की मर्यादा और कबीलाई लोक-संस्कृति में भी जीवित रहती है।